Friday, May 11, 2012

चित्कित्सा में विकल्प : प्रतिवेदन - (२)




" मनोज कुमार जी ने जो उदाहरण दिया है उस केस में कैंसर रहा ही नहीं होगा । जगह जगह दिखाने से न निदान होता है न उपचार जब तक आप सही जगह न जाएँ ।
वर्ना यहाँ तो कितने ही कृपालु बाबा मिल जायेंगे । "

यहाँ मनोज कुमार जी की टिप्पणी को दिखाना प्रासंगिक होगा |

" बहुत सही प्रश्न उठाया है आपने। कौन सी दवा लोगों को सुलभ है।
एक दो वाकया शेयर करने का मन कर गया।

चंडीगढ़ में था। मेरे एक मित्र के पिता को गले का कैन्सर था। कई जगह इलाज करवा चुके थे। एक जगह से मालूम हुआ कि हिमाचल के पहाड़ों पर रहने वाले कुछ लोग एक प्रकार की जड़ी देते हैं जिसकी जड़ को कूट कर पीने से कैन्सर ठीक होने की संभावना बढ़ जाती है। मित्र के पिता को वह दिया गया वे बच गए। जो लोग वह जड़ी बूटी देते थे कोई पैसा आदि नहीं लेते।

गंगा राम में मेरे पिता के कैन्सर का ट्रीट्मेंट हो रहा था। केमोथेरापी के नाम पर जो दवा वे दे रहे थे उसका दाम बाइस हजार रुपए थी। मैंने डॉक्टर से कहा था कि मैं तो क़र्ज़ लेकर भी इनके लिए इतनी कीमती दवा दे पा रहा हूं। महीने में आप पांच ईजेक्शन दे चुके हैं। ग़रीब कहां से लाएगा। जब होस्पिटल ने रिलिज कर दिया उसके दो महीने के भीतर वे गुजर गए। "

एक डॉक्टर के तरफ से आया यह वक्तव्य अचंभित कर गया कि," मनोज कुमार जी ने जो उदाहरण दिया है उस केस में कैंसर रहा ही नहीं होगा  |"

इस वक्तव्य से बहुत कुछ प्रकट होता है :

è        किसी पद्धति विशेष में इतनी अंध श्रद्धासोच की ऐसी एकांगी पराकाष्ठा कि उस पद्धति    विशेष के अतिरिक्त अन्य कहीं भी किसी भी तरह से सफल उपचार संभव ही नहीं है |

è         और यदि कोई ऐसा दावा या महज सूचना भी देता है कि अन्य कहीं भी कोई व्यक्ति या  पद्धति किसी ( महत्वपूर्ण व सम्मानित ..? ) व्याधि का सफलता पूर्वक उपचार कर रही है तो हम बिना किसी व्यावहारिक जाँच केउसे सिरे से ही नकार देंगे कि जिस मर्ज़ का उपचार हुआ वोकैंसर जैसी महत्वपूर्ण व्याधि नहीं रही होगी ...कोई साधारण सी बीमारी रही होगी...|


è यहाँ कैंसर जैसी व्याधियों की  प्राथमिक जाँच प्रक्रिया पर भी थोड़ा ग़ौर फरमायें 

è          क्या  कोई मरीज़  स्वयं ही यह निर्धारित करता है  कि उसे कैंसर है ?

è         या फिर उसे कोई बताता है कि वो फलाँ बीमारी से ग्रसित है ?

è        और कैंसर जैसी भीषण ( महत्वपूर्ण व सम्मानित ) व्याधियों का निर्धारण आज के दौर  में किस पद्धति के अंतर्गत किया जाता है ?

è       ज़ाहिर है यह काम मरीज़ के द्वारा नहीं बल्कि पैथोलोजिकल लैब्स के द्वारा निष्पादित   होता है |

è       फिर बिना यह पूछे कि क्या गले के कैंसर का निर्धारण पैथोलोजिकल लैब के द्वारा हुआ था या नहींपहले से ही यह वक्तव्य कि "कैंसर रहा ही नहीं होगा" पद्धति विशेष कि प्रति अवैज्ञानिक और अयाव्हारिक प्रतिबद्धताअथवा कोई राजनैतिक समीकरणया फिर उस पद्धति विशेष के सेनापति होने का मिथ्या अहंकार ही प्रदर्शित करता है |

è      या फिर यह उदघोषणा कि कैंसर जैसी लाइलाज व असाध्य बीमारियों का इलाज दुनिया में हमारे अलावा और कोई  कर ही नहीं सकता... गोया कि बीमारियाँ न हुईंइनकी बपौती हो गयीं...! 


è  ऐलोपैथिक चिकित्सकों का यह मिथ्यापूर्ण अति-विश्वासअतिरंजित आडम्बर से भरा संवेदनशून्य व्यवहार और आयातित अहंकार ही इस चित्कित्सा पद्धति के पतन का कारण बनेगा...!

" गंगा राम में मेरे पिता के कैन्सर का ट्रीट्मेंट हो रहा था। केमोथेरापी के नाम पर जो दवा वे दे रहे थे उसका दाम बाइस हजार रुपए थी। मैंने डॉक्टर से कहा था कि मैं तो क़र्ज़ लेकर भी इनके लिए इतनी कीमती दवा दे पा रहा हूं। महीने में आप पांच ईजेक्शन दे चुके हैं। ग़रीब कहां से लाएगा। जब होस्पिटल ने रिलिज कर दिया उसके दो महीने के भीतर वे गुजर गए। "

यह अनुभव अकेले मनोज कुमार जी का नहीं है सैकड़ों नहीं हजारों नहीं बल्कि लाखों लोगों के साथ इसी प्रकार के हादसे हुए है हो रहे हैं और हमारे तथाकथित कैंसर विशेषज्ञ ( oncologist  )  ' पूरी निष्ठा  के साथ ग़रीब - जन को चौतरफा  मार दे  रहे  हैं यथा –

è         इलाज के नाम पर उत्पादक मूल्य की तुलना में हज़ारों  गुने मुनाफे के साथ आर्थिक मार व  शोषण...!


è     पूर्णतया असंवैधानिक ग़ैर-क़ानूनी  एवं सर्वथा अनैतिक मानवीय मूल्यों व  संवेदनहीन तौर- तरीकों से मरीज़ों को धोखा देते हुएपूरी तरह से अनभिज्ञ रखते हुएआयातित दवाओं का इलाज व उपचार के नाम पर नैदानिक परीक्षण  ( Clinical  Trial )  करना |

è         इन खतरनाक दवाओं के हानिकारक प्रभावों पार्श्व व दूरगामी  परिणामों सम्पूर्ण स्वास्थ्य पर होने वाले दीर्घ कालीन नकारात्मक प्रभावों / परिणामों से मरीज़ों को या तो पूर्णतः अनभिज्ञ  रखना अथवा उन्हें समूची समुचित  जानकारी नहीं  देना या अधिकांश मामलों में उन्हें सर्वथा ग़लत जानकारी के साथ झूठे आश्वासन देना |

è       परिणामतः,  उन्हें अक्सर और अधिक स्वास्थ्य विभीषिका की ओर धकेल कर अनागत मृत्यु को आसन्न बना देना |

è      और विस्तृत अर्थों में - ( आर्थिक शारीरिक भावात्मक तथा बिन मांगे इच्छा मृत्यु का जामा पहना कर ) मोक्ष दिलाना |

 जगह जगह दिखाने से न निदान होता है न उपचार जब तक आप सही जगह न जाएँ ।
वर्ना यहाँ तो कितने ही कृपालु बाबा मिल जायेंगे । "

è      और यदि  ( ज़ाहिरा तौर पर )  सही जगह '   जाने से भी विधायक स्वास्थ्य प्रदाता निदान उपचार अथवा इलाज न मिले तो ?

è       क्या  बीमारी हालात और मजबूरी का मारा मरीज़ उस तथाकथित सही जगह पर ही एक बेहद मँहगी असामयिक मृत्यु  की प्रतीक्षा करता रहे ?

è      अथवा आयातित नयीविकसित तथा बेहतर दवा के नाम पर निदानात्मक परीक्षण के लिए ख़ुद को बलि का बकरा ( Guinea  Pig  ) बनने दे ?

 वर्ना यहाँ तो कितने ही कृपालु बाबा मिल जायेंगे । "

è   क्या मान्यता प्राप्त विशेषकर एक पद्धति विशेष के अलावा देश में अन्य जितनी भी वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियाँ और उनके चिकित्सक हैंवे सभी कृपालु बाबा जैसे सम्बोधनों के अधिकारी हैं 

è      यह कैसी मानसिक ग़ुलामी की गिरफ्त में आ गए  हमारी मौजूदा चिकित्सा की मुख्य धारा के चिकित्सक...?

è        यह कैसी विडम्बना है,  कैसा दुष्ट सम्मोहन है कि हमारे अपनेअपनी ही सर्वोत्कृष्ट धरोहर को कोसने लगे हैंगालियाँ देने लगे हैं और शत्रुता का भाव रखने लगे हैं...?


शेखर जेमिनी
अगले सन्देश में जारी...

4 comments:

veerubhai said...

yOUR ARGUEMENTS SHOWS EMPATHY TOWARDS THE PATIENT AND TOUCHES THE CHORD OF REALITY HERE AND THERE.ALLOPATHY REMAINS THE MAIN STREAM TREATMENT FOR WHATEVER REASONS AND TIMES RECOGNIZES ITS LIMITATIONS TOO PEOPLE LOVE ALTERNATIVE THERAPIES LIKE HINDI AS THE NATIONAL LANGUAGE EVEN THOUGH BOTH SHARE THE SAME FATE.GOOD TO READ YOUR FOLLOW UPS.

sir pl remove the word verifications,it makes commenting a painful process at times in our high profile times.I am working with a note book as an stop gap arrangements so the comments are in english.
Thanks for both of yr comments.I notice and visit yr blogs fst time.Thanks for the follow ups.

veerubhai said...

आपने तर्क को उसकी सहज परिणति तक ले जाकर अपनी बात rakhee है सौम्यता se यह अच्छी बात है .कुछ सवालों के ज़वाब भविष्य के गर्भ में हैं आज हमारे पास नहीं हैं .सबूत नहीं हैं उनके .यह daur साक्ष्य का है .

veerubhai said...

नवभारत टाइम्स में सद्य और अद्यतन प्रकाशित अपने चिठ्ठों को कृपया यहाँ भी जगह दीजिए .कुछ ला -परवाही कुछ हिंदी टंकड़ की सीमाएं कभी खुलके खेलती हैं तो कभी अपनी अल्पज्ञता भाषा सम्बन्धी वर्तनी सम्बन्धी .फिर लिखने का अतिरिक्त जोश और उतावली , ऐसे में कई मर्तबा पूरा होश ही कहाँ रहता है .आपके ध्यान आकर्षण का सैदेव स्वागत रहेगा .

veerubhai said...

बेशक आईदा अस्त्र ही लिखा जाएगा .धन्यवाद .